चौडा मैदान स्थित घर में 17 मई, 2013 की दोपहर को चोरी की वारदात सामने आयी। चौडा मैदान बाजार के बिल्कुल जगदीश चन्द्र के मकान में यह वारदात हुएl जगदीश चन्द्र अपनी पत्नी सुनीता और दो बच्चों के साथ इस मकान में रहता है।
चोरी की वारदात का पता उस समय लगा जब जगदीश चन्द्र की पत्नी, जोकि सेनिटेरियम हस्पताल में कार्यरत है, दोपहर 2 बजे जब लंच ब्रेक में घर आई।
उन्होंने तत्तकाल बालुगंज पुलिस को सूचित किया। शुरुआती छानबीन से मालूम पड़ा है की चोर बाथरूम की खिडकी तोडकर अन्दर घुसे थे और उन्हें जो भी नकदी घर में मिली उसे ले गये। हालांकि सामान चोर ज्यादा नहीं ले जा सके परन्तु चोरी की वारदात को दिन दिहाडे अंजाम देने से चोरो के होसले से पूरे बालुगंज में दहशत का माहौल है। जहां मकान में चोरी हुई है उसके साथ एक बहुत पुराना ढारा है। आसपास के लोगों का कहना था कि उसमें दिन और रात कई असमाजिक तत्व बैठे रहते हैं। उसी जगह से वे इस मकान की रैकी करते रहे और घर में किसी को न पा कर पीछे से खिडकी तोड दी।
बालूगंज पुलिस ने तत्तकाल कार्यवाही करते हुए एफ आर आई दर्ज कर ली है और उनकी छानबीन जारी है।





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इस संदर्भ में मेरा निवेदन जिला प्रशासन और पुलिस विभाग से यह है कि शिमला में बहुत अर्से से दिन दिहाडे चोरियों की वारदातें बढी हैं और नि संदेह पुलिस कार्यवाही भी कर रही है। मैं यहां तीन तथ्य प्रशासन के समक्ष रखना चाहता हूं-
1- शिमला में जगह जगह पुराने टूटे हुए मकान मौजूद हैं। वे मकान असमाजिक तत्वों के अडडे बने रहते हैं क्योंकि वहां वे नशे इत्यादि के साथ इस तरह की वारदातों की योजनाएं बिना भय के बना सकते हैं। ये भवन नशेडियों के अडडे भी बन जाते हैं। पुलिस प्रशासन यदि इन मकानों में नियमित छापे मारें ओर गशत करें तो इन अडडों से असमाजिक तत्व इस तरह की वारदातों को अंजाम नहीं दे सकते। नगर निगम को भी इन भवनों को गिराने इत्यादि के लिए आवश्यक कदम उठाने चाहिए।
2- हिमाचल पुलिस के पास डॉग सक्वार्ड उपलब्ध है और चोरी की वारदात चाहे छोटी हो या बडी पुलिस को इसका इस्तेमाल करना चाहिए। चौडामैदान वारदात में भी अगर पुलिस कुत्तों का इस्तेमाल करती तो चोरों तक पहुंचा जा सकता था। इसलिए यह सुनिश्चित होना चाहिए कि हर चोरी की वारदात में कुत्तों का प्रयोग हो।
3-शिमला शहर में भिखारियों और दूसरे गरीब बेघर लोगों के बच्चे आवारा घूमते रहते हैं। इनमें मासूम बच्चों से लेकर 10 – 12 साल तक के बच्चे शामिल हैं। रिज मैदान और दूसरी जगहों पर ये बच्चे झुण्डों में बाहर से आने वाले देशी तथा विदेशी पर्यटकों के पीछे पडे रहते हैं। हमने देखा है कि ये पर्यटकों के हाथों से कई बार खाने तक की वस्तुएं छीन लेते हैं। जिला प्रशासन या प्रदेश सरकार बरसों से इस समस्या का कोई समाधान नहीं कर पाई है। रिज पर ये बच्चे और सांप वाली औरतें तथा कुछ अन्य मांगने वाले पर्यटकों और स्भानीय लोगों की सरदर्द का सबब बने हुए हैं। शहर के लोग पहले ही आवारा कुत्तों, बंदरों से परेशान है और उसके उपर यह तीसरी समस्या उन्हें और भी परेशान करती है। ये बच्चें दिन भर मांगते हैं। बडे होकर ये क्या क्या कर सकते हैं यह सहज अनुमान लगाया जा सकता है। हमारा मानना है कि बडे होकर ये भी इस तरह की वारदातों को अंजाम दे सकते हैं। जिला प्रशासन इस समस्या के समाधान के लिए आवश्यक कदम उठाएं और यह सुनिश्चि करें कि रिज या दूसरी जगह पर मासूम बच्चे भीख न मांगे और इनके रहने और पढने के लिए स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ मिलकर योजना बनाएं।
एस आर हरनोट
लेखक-अध्यक्ष हिमालय साहित्य, संस्कृति एवं पर्यावरण मंच
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