वेलन्टाइन डे – प्रेम का बाज़ारीकरण या और कुछ

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(दीपक सुन्द्रियाल) 14 फरवरी … जिसकी प्रतीक्षा विदेशो में इसकी जनक भूमि के बाशिदो को कम हिंद देश के माडर्न प्रेमियो को अधिक रहती है | इतिहास के पन्नों में ऐसे कितने ही संत भारत में हुऐ जिन्होंने प्रेम को परमात्मा से मिलन की सबसे सरल राह बताया है, ये कहना अतिश्युक्ति नहीं होगी की प्रेम का सन्देश विषव् को भारत ने ही दिया “वसुदेव कुताम्बम “ की विचार धारा सम्पूर्ण विश्व का मार्गदर्शन करती रही है ,परन्तु प्रेम का ये नया कांसेप्ट हमे इम्पोर्ट करना पड़ा या यूँ कहे की हमे हर बात में वेदेशियो की अनुमति लेने की आदत सी है , चाहे वो घरेलु जड़ी बूटियों से चिकत्सा हो, योग व ध्यान साधना हो , अर्थशास्त्र की बारीकियां हो, अतिथि सत्कार व काम के प्रति आदर की भावना हो, अस्त्रोलोजी व भविष्वाणी हो, या कुश्ती जेसे खेल की दीवानगी हो | भारत की हर धरोहर का दोहन विदेशियों ने किया जो अच्छा लगा साथ ले गए और हमे दे गए जी हजूरी की कला … इसका सबसे बड़ा उदहरण आज भी हिंदी की उपेक्षा और अंग्रीजी को समन्ना है |

बेडियों में जकड़ी मानसिकता आज भी हर मत्वपूर्ण दस्तावेज़ , हर मत्वपूर्ण पद , हर मत्वपूर्ण व्यक्ति से अंग्रीजी की अपेक्षा करती है | ये 200 साल की पराधीनता का परिणाम ही तों है हम आज भी बौधिक और मानसिक गुलाम है, जो आज भी शहर हो या गावं सब के जीवन का एक ही धय है , मेरा बेटा अंग्रीजी स्कूल में पडे , अंग्रेजी बोले , गिटार बजाये , हिप होप करे , एम् न सी कंपनी में नौकरी करे और अंत में ग्रीन कार्ड ले विदेश में ही बस जाये | शायद यही कारण है अपने देश की महान सांस्कृतिक विरासत को ठुकरा कर वेदेशी पिछलगू बनते जा रहे है | हमारे माडर्न प्रेमी …(जिन्हें प्रेमी कहना प्रेम का उपहस होगा ) प्रेम का उलेख होते ही चहक उठ्ते है … वेलन्टाइन डे.. |

वेलेन्टाइन नाम का कोई सन्त असल में हुआ या भी है या नहीं, इस पर यूरोपीय इतिहासकारों में भी मतभेद की स्थति है| वेलन्टाइन डे …ये अब डे कहाँ रह गया है ?? पूरा सप्ताह बनता जा रहा है | सप्ताह भर मनाया जाने वाला इश्क का अनूठा आनुष्ठान … ज़नाब आनुष्ठान नहीं तों और क्या है जब सारा का सारा ब्रमांड ( कम से कम हमारे देश के युवाओ को तों ऐसा ही लगता है ) प्रेम में डूबा हुआ हो तों इसे आनुष्ठान की संज्ञा देना अथिश्योक्ति न होगी|

हफ्ते भर का मसाला ..आरम्भ होता है रोज डे से , अब रोज डे है तों बिना रोज के कैसे चल पायेगा तों जनाब प्रथा के अनुसार अपनी प्रेमिका को ( जो इस वर्ष की प्रेमिका या प्रेमी हो आवश्यक नहीं की अगले वर्ष भी हो ) महंगा रोज देना अनिवार्य है और कहाँ से खरीदना है ये मिडिया बता ही रहा है | इस के बाद आता है प्रपोस डे …यानि प्यार के इजहार का दिन जो आठ फरबरी को मनाया जाता है | अंग्रेजी प्रेम हो और चोकलेट न हो तों कैसे चलेगा , नो फरबरी का दिन है चोकलेट डे … चोकलेट बेचने का इस से अच्छा तरीका होगा भी क्या ? फिर आता है टेडी डे …इस दिन बड़े से गिफ्ट पैक में बड़ा सा टेडी आपको प्रेमका को गिफ्ट करना होता है हाँ …खरीदना कहाँ से है ये तों आपको बताया जा चूका है | अब आता है प्रोमिस डे …ग्यारह फरवरी को जिस दिन प्रेमी प्रेमिका जन्मो के वादे करते है साथ जीने मरने की कसमे खाते है (हलाकि … जिसमे कुछ शाम तक भी निभा नहीं पाते) | बारह फरवरी का दिन जो की किस डे है इस दिन क्या होता है ये आप समझ ही गए होंगे | तेरह फरवरी को हग डे …यानि की गले लगा कर प्रेम करने का दिन , इतने इंतज़ार के बाद वो दिन आता है जिस के लिए सारी भूमिका बाँधी गयी है यानि प्रेम दिवस वेलन्टाइन डे … इसे प्रेम दिवस की संज्ञा देना तर्क संगत तों नहीं है परन्तु वेलन्टाइन डे का भारतीयकरण प्रेम दिवस ही बनता है |

उपभोक्तावाद व बाजारीकरण के चलते वेलन्टाइन डे एक महापर्व बनता जा रहा है और युवा वर्ग बिना सोचे समझे इसके चक्रव्यु में फंसा जा रहा है | परन्तु पर्व के आड में प्रेम का बाजारीकरण भारत की परम्परा कदापि नहीं थी | कालिदास, श्रीहर्ष , बाणभट्ट सरीखे कितने ही कवी देश में हुए ,प्रेम रस में डऊबे उपन्यास कविताए छंद प्रेम स्त्रोत बन प्रेम का प्रचार प्रसार कर रहे है परन्तु आज कितने युवा साहित्य में रूचि रखते है जो उन्हें इसका ज्ञान भी हो | वर्तमान के भूमण्डलीकरण के दौर में प्रेम का स्वरूप भी बदल चुका है , आपनी सभ्यता अपनी संकृति से हम कितने दूर है और ऐसी सभ्यता का आनुसर्ण कर रहे है जिसका कोई प्रमाण भी नहीं | वासना एवं संकीर्णता के चलते प्रेम के मायने बदलते जा रहे है ,हमारे स्वार्थ की वृत्ति इतनी बढ़ चुकी है कि प्रेम के स्त्रोत की मूल धारण विलुप्त होती जा रही है। प्रेम को साधने के लिये युवा आज छल, कपट, प्रंपंच, षडयंत्र,आदि का सहारा ले रहे है । प्रेम का बाजारीकरण होता जा रहा है । प्रेम …समर्पण सम्मान एवं निस्वार्थ न रहकर अब स्मार्ट, स्टालिश व सेक्सी का सूचक हो गया |

ऐसा नहीं है भारतवर्ष में प्रेम पर कोई प्रतिबंध है भारत में मदनोत्सव, वसन्तोत्सव और कौमुदी महोत्सव की शानदार परम्पराएँ रही हैं। प्रेम की पराकाष्ठा गोपियों के निस्वार्थ प्रेम व समर्पण में देखि जा सकती है शिव को पाने के लिए पार्वती ने कठोर तपस्या की थी…भारतीय संस्कृति हमेशा से प्रेम प्रधान रही है। प्रेम व काम का जो स्थान हमारी परम्परा में है हिन्दू धर्म में है, , वह विषव में कहीं और कहाँ । धर्मशास्त्रों में –धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष– में काम का महत्व दिया गया है, काम ही सृष्टि का मूल है। काम न हो तो सृष्टि कैसे चलेगी ? काम पर लिखे गए महर्षि वात्स्यायन के ग्रन्थ को कामशास्त्र कहा गया है | शास्त्र … किसी अश्लील ग्रन्थ को कोई शास्त्र कहेगा ? प्रेम भारत के कण कण में है , काम प्रेम का एक अंग हो सकता है मगर ये पाश्चात्य संस्कृति की आड़ में काम को प्रेम का पर्याय बनाने पर आमादा है ..यहाँ प्रेम की शुरुवात और अंत आत्मा से न होकर जिस्म की गोलाइयों तक सीमित हो गया जो कम से कम भारतीय परिवेश में वर्जित है… ये पश्चातिया संस्कृति है जिसमे बूढ़े माता पिता को ओल्ड ऐज होम में छोड़ कर …मदर दे …फादर दे मनाया जाता है | एक दिन का प्रेम ? क्या तर्क संगत लगता है ? “वेलेन्टाइन डे’”का विरोध अगर इसलिए किया जाता है कि वह प्रेम सबंधो से जुढ है तो इससे बढ़कर अभारतीयता क्या हो सकती है ?

क्या सच में प्रेम के लिए हमे किसी विशेष दिन की आवश्यकता है ….जी हाँ है क्यूंकि बात धंधे की है | वेलेन्टाइन डे’ के नाम पर करोड़ों रुपयों के कार्ड, चोकलेट व उपहारो का धधा चलता है | विज्ञापन को इस तरह बनाया जाता है जैसे वेलेन्टाइन डे हमारे भारतवर्ष का कोइ महापर्व हो | प्रेम का इजहार करना अत्यंत आवश्यक है सारा सप्ताह प्रेम के नाम पर धंधा चलाया जाता है | ‘वेलेन्टाइन डे’ पर फिजुल्कार्ची का एक पर्याय बन कर रह गया है इसका विरोध जरूरी है। विरोध इसलिए भी आवश्यक है कि क्योंकि घाटा आखिरकार हमारा है , न केवल धन का बल्कि सभ्यता का भी । परन्तु अपने यहाँ वेश-भूषा ,भोजन, भजन , और भाषा– हर क्षेत्र में पश्चिम की नकल को ही तों अकल माना जाने लगा है। इसीलिए प्रेम दिवानी मीरा , रास रस में विलानी राधा , भोले को पाने को कडी तपस्य करती पार्वती हमारी नज़र से ओझल होती जा रही है और किंवदन्तियों के अँधेरे में से पश्चमी प्रेम देव वेलेन्टाइन अपना कर्णधार बनता जा रहा है ।

वेलेन्टाइन को नायक कहना जितना हास्यास्पद लगता है , उतना ही खलनायक कहना भी | क्यूंकि वेलेन्टाइन ने रोम के नौजवानों को न अनैतिकता सिखाई, न अनाचार का मार्ग दिखाया और न ही दुश्चारित्र्य को प्रोत्साहित किया | वेलेन्टाइन की आड़ में अगर पश्चिमी कम्पनियाँ हमे अपना शिकार बना रही हैं तो वेलेन्टाइन भी क्या करे ?

वैलेंटाईन डे के विरोधियों का कहना है कि वैलेंटाईन से सांस्कृतिक प्रदूषण फेल रहा है, युवा भर्मित हो रहा है जो काफी हद तक सही तर्क है …परन्तु मजे की बात ये है की आज भी आधिकतर प्रेमी युगल वैलेंटाईन डे के दिन हिंदू मंदिरों का हे रुख करते है …क्यूंकि हिंदुत्व के जड़े इतनी भी खोखली नहीं की हवा के साथ हवा हो जाये …. भारतियो ने अंग्रेजी वैलेंटाईन डे को भी हिंदू रंग में ढाल लिया है जो एक उम्मीद के किरण है परन्तु इस प्रेम के बाजारीकरण के प्रति हमें सचेत रहना होगा क्यूंकि प्रेम तों शास्वत सत्य है अजर …अमर …अमिट, जेनरल स्टोर का कोई फीता नहीं जो कोइ भी खरीद के पहन ले …|